इस साल की शुरुआत में जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भारत आये और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की तो उनकी इस गतिविधि के बारे में जानने की उत्सुकता सिर्फ भारत और पाकिस्तान से आला राजनयिकों को ही नहीं थी, बल्कि गुजरात और दीव के सैकड़ों मछुआरों के परिवारों को भी थी।

गुजरात तट पर 96 किमी लम्बाई में फैला दलदला कच्छ के रण में विवादित सरक्रीक क्षेत्र से मछली पकड़ते समय पाकिस्तानी तटरक्षक बल ने इन भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार कर लिया था जो लम्बे समय से पाकिस्तानी जेलों में सड़ रहे हैं। अब इनका नसीब दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत के सकारात्मक परिणाम पर निर्भर करता है।

क्रीक सीमा जो अरब सागर की ओर खुलती हैं पाकिस्तान के सिंध प्रांत और भारत के गुजरात के कच्छ क्षेत्र को बांटती है। भारत और पाकिस्तान दोनों ही सर क्रीक के खासे बड़े हिस्से को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में होने का दावा करते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच सालों से कई दौर की बातचीत के बाद भी सर क्रीक विवाद हल नहीं हो पाया।

भारत में सभी राज्यों की तुलना में गुजरात में सबसे लंबा समुद्र तट है। फिर भी वहाँ शायद ही एक भी मछली जिंदा बची होगी, क्योंकि प्रदूषण और तटीय क्षेत्रों में उद्योगों के पैर फैलाने के कारण समुद्री जल दूषित हो गया है। राज्य में बड़ी संख्या में रहने वाले मछुआरों की जरूरतों के प्रति उपेक्षा का व्यवहार करते हुए गुजरात की मोदी सरकार लगातार पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन कर गुजरात के समुद्र तटों पर अंधाधुंध तरीके से उद्योगों को फैलाने की अनुमति दे रही है।

इसके चलते गुजरात और दीव के मछुआरों को बढ़िया मछली पकड़ने के लिये पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा पकडे़ जाने के खतरे का बावजूद काफी दूर जाना पड़ता है। क्योंकि बढ़िया क्वालिटी की मछली अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में ऊंचे दामों पर बिक जाती है।

पोरबंदर बंदरगाह पर मछली पकड़ने वाले जालदार जहाज के डेक पर बैठे माधव सिंह सोलंकी बताते हैं कि सिर्फ बीस साल पहले तक हम इस तट के पास ही बड़ी मात्रा में मछलियां पकड़ते थे। आज तट के चारों ओर भारी उद्योग लग गये हैं। ये उद्योग अपना कचरा खुलेआम समुद्र में फेंक रहे हैं और अधिकारी बस चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। इसके चलते समुद्र का पानी दूषित हो गया है। आप यहां बढ़िया क्वालिटी की मछली अब नहीं पायेंगे।

सोलंकी चौथी पीढ़ी का मछुआरा है और अब वह छह ट्रॉलरों का मालिक है। वह कहते हैं कि भारतीय मछुआरों, जो पाकिस्तानी जेलों में हैं, के अलावा पाकिस्तानी तटरक्षक बल द्वारा पिछले वर्षों में पकड़े गये 430 मछली पकड़ने वाले ट्रॉलर भी पाकिस्तान के कब्जे में ही हैं। उन्होंने शिकायती लहजे में कहा कि 2003 के बाद से पाकिस्तानी अधिकारियों ने एक भी ट्रालर वापस नहीं लौटाया जिसे उन लोगों ने जब्त किया था।

नए मछली पकड़ने वाले ट्रॉलर काफी महंगे होते हैं। खरीदते समय इनकी लागत 20 लाख से अधिक पड़ती है। ज्यादातर ट्रालर मालिक इस मछली पकड़ने वाली नाव को खरीदने के लिये भारी ऋण लेते हैं। यदि एक बार भी पाकिस्तानी सरकार ने उनकी नाव पकड़ ली तो वे कर्ज में डूब जाते हैं। उनके रोजगार का एक मात्र साधन उनकी नाव न होने के कारण वे न तो कमा पाते हैं और ना ही बैंकों से कर्ज लिये पैसे को लौटा पाते हैं।

जरदारी – मनमोहन सिंह की सकारात्मक बातचीत समाप्त होने के बाद इस इलाके के मछुआरों में उम्मीद जगी है कि शायद वे जेल से छूट जायेंगे। उनकी उम्मीद गलत भी नहीं थी, वार्ता के तुरंत बाद पाकिस्तान ने 26 भारतीय मछुआरों को जेल से रिहा कर दिया।

वर्षों से मछुआरों की गिरफ्तारी और उसके बाद रिहाई भारत और पाकिस्तान के राजनीतिक माहौल पर ही निर्भर करती है। जब दोनों देशों के बीच संबंध खुशनुमा रहते हैं तो किसी भी तरह की गिरफ्तारी नहीं होती। संबंधों के अनुकूल किया गया है, वहीं जब भारत-पाकिस्तान के संबंधों में कड़वाहट आती है तो गिरफ्तारी का आंकड़ा भी काफी ऊपर जाने लगता है। 26/11 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद दोनों पक्षों के बीच संबंधों में बढ़ी तनातनी के चलते भारी संख्या में भारतीय मछुआरों की गिरफ्तारी की गयी।

‘‘हम भारत के खिलाफ पाकिस्तान की कूटनीतिक लड़ाई में सबसे छोटे प्यादे हैं’’ पोरबंदर मछुआरा संघ के सलाहकार और पूर्व अध्यक्ष जीवन जंगी मायूस हो कर कहते हैं। ‘‘दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण होने का खामियाजा गरीब मछुआरा ही क्यों भुगते? हमारी गिरफ्तारी या रिहाई के भारत-पाक संबंधों की स्थिति पर क्यों तय होती है?’’ वह पूछते हैं।

पोरबंदर बंदरगाह पर जंगी के कार्यालय ठीक सामने सैंकड़ों नावें खराब हालत में पड़ी थीं। आप वहां जायेंगे तो देखेंगे कि मछुआरे इधर-उधर घूम रहे हैं, कुछ मरम्मत के काम में व्यस्त हैं, खाली मछुआरे ताश खेल कर अपना समय बिता रहे हैं और कुछ इस चर्चा में मशगूल हैं कि इस्लामाबाद वार्ता की विफलता का सीधा प्रभाव पाक जेलों में बंद मछुआरों पर पड़ेगा।

मछुआरों का एक समूह एक नाव की मरम्मत में जुटा हुआ था। उनमें से एक ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। 50 साल का नारन रत्न अपनी वास्तविक उम्र से दस साल बूढ़ा ही दिख रहा था। उसने 2 साल कराची जेल में बिताये हैं जब पाकिस्तानी कोस्ट गार्ड ने उसकी मछली पकड़ने वाली नाव को जब्त कर लिया था। उसकी कमर और पीठ के निचले हिस्से में घाव हो गये थे क्योंकि पाकिस्तान की अत्यधिक भीड़ वाली जेल में उसे एक ही मुद्रा में सोने के लिये मजबूर कर दिया गया था।
रत्ना जिसकी पीठ अब हमेशा के लिये खराब हो गयी बताते हैं कि ‘‘हमें एक करवट में दीवार की ओर मुंह करके सोना पड़ता था, मेरे पीछे दूसरा कैदी भी उसी करवट में सोता था और उसके पीछे अन्य दूसरे कैदी। जब भी मैं करवट बदलने की कोशिश करता तो जेल गार्ड मेरी पीठ पर लात मार कर मुझे वापस पहले वाली मुद्रा में सोने को मजबूर कर देता।’’ उसने कहा।

रिहाई के बाद से नारन रत्ना फिर कभी समुद्र की ओर नहीं गया। जंगी कहते हैं कि नारन अब मछुआरे की तरह नाव पर कोई भी काम कर पाने की स्थिति में नहीं है। अब वह सिर्फ बंदरगाह के आसपास ही छोटे-मोटे काम कर सकता है। ‘‘वह मुश्किल से कमा पाता है पर उसकी पीठ की चोट की वजह से उसे काम करने में खासी मुश्किल आती है।’’ जंगी कहते हैं।

जंगी के मुताबिक गुजरात-दीव तट पर रहने वाले ज्यादातर मछुआरे अनपढ़ हैं और मछली पकड़ने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं कर सकते। मछली पकड़ने की यह कला उन्हें अपने पिता और पूर्वजों से मिली है। मछुआरों में साक्षरता दर 20 प्रतिशत से भी कम है। अब हम ऐसा ठोस प्रयास कर रहे हैं जिससे कम से कम मछुआरों के बच्चे स्कूल जायें और आने वाले दिनों में मछली पकड़ने के अलावा दूसरे रोजगार के साधन से अपनी आजीविका चला सकें।

दीव के वनकबारा की दूरी पोरबंदर से चार घंटे की है। स्थानीय मछुआरे सिर्फ मछली पकड़ने की कला में माहिर हैं और उसी के सहारे अपना जीवन चला रहे हैं। साक्षरता दर यहां भी काफी कम है।

पहली नजर में वनकबारा दीव और गुजरात के समुद्र तट पर मौजूद दूसरे गांवों से अलग दिखता है। हालांकि, वनकबारा गांव के बुजुर्ग दावा करते हैं कि मछली पकड़ने वाले इस गांव का हर पांचवां आदमी पाकिस्तानी जेल में कुछ समय कैद रहा है।

पाकिस्तानी जेलों में कैद लोगों के परिवार वालों का जीवन यहां काफी कठिन है। किशोर उम्र के लड़कों के एक समूह के पीछे गलियों के जाल में जाते हुए मैं लखीबेन रामजी बामनिया के घर पहुंचा जिसका पति और बेटा दोनों दो साल पहले से पाकिस्तानी कोस्ट गार्ड द्वारा पकड़े जाने के बाद से ही पाकिस्तान की जेल में बंद हैं। परिवार के दो कमाऊ सदस्य अब पाकिस्तान में जेल में बंद है, लखीबेन को अपनी ननद और पोते-पोतियों समेत खुद के जीवन को भी बचाना है।

‘‘वनकबारा ने कोई भी व्यक्ति अमीर नहीं है। मैं यहां घरेलू दाई का काम भी नहीं खोज सकती।’’ लखीबेन अफसोस के साथ कहती हैं। अपने आंसू वापस पोंछकर वह कहती है कि उसका परिवार भुखमरी के कगार पर पहुंच गया है। ‘‘मैं नहीं जानती कि अगले साल तक मेरे पोते-पोतियां जिंदा भी रह पायेंगे। कहीं से कोई मदद भी नहीं मिल रही।’’ उसने कहा।

मैंने उनसे पूछा कि उन्हें कैसे मालूम हुआ कि उनके पति और बेटे को पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार किया है। उसने बताया कि उसका भाई उस दिन एक दूसरी नाव पर था और उसने अपनी आंखों से देखा कि पाकिस्तानी अधिकारी उसके पति और बेटे की मछली पकड़ने वाली नाव पर सवार थे। वह मेरे पास आया और मुझे कहा कि मेरे पति की नाव और छह दूसरी नौकाओं से मछुआरों को पाकिस्तानी अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लिया है।

गिरफ्तार मछुआरों के बारे में पता लगाने में परिवारों को अक्सर महीनों नहीं तो कई दिन और कई सप्ताह लग जाते हैं। आमतौर पर पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी के बारे में परिवार के सदस्यों को सूचित करने के लिए किसी भी प्रकार की कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी जाती। ‘‘ज्यादातर एक दूसरे के जरिये ही पता चलता है। कभी-कभी यदि भाग्यशाली रहे तो कैदी के द्वारा भेजा गया पत्र ही जानकारी का माध्यम बनता है।’’ लखीबेन कहती हैं जिनके पास उनके पति और बेटे द्वारा कालकोठरी से भेजा गया पत्र दो साल बाद आज भी रखा है।

अब मछुआरा संघ भारत के उच्चतम न्यायालय की मदद लेने पर विचार कर रहा है जिससे इस अप्रिय समस्या का स्थायी समाधान तलाशा जा सके। ‘‘हमें गिरफ्तारियों की स्थिति में कार्रवाई के लिये स्पष्ट दिशानिर्देशों की स्थापना की जरुरत है।’’ जंगी कहते हैं।

जब तक लम्बे समय से भारत और पाकिस्तान के बीच क्षेत्रीय विवाद का कारण बने सर क्रीक की समस्या का हल नहीं होगा, जब तक गुजरात के तटीय क्षेत्रों में उद्योगों की अंधाधुंध स्थापना पर रोक नहीं लगेगी, गुजरात और दीव के लम्बे-चौड़े तटीय क्षेत्र में मछुआरों की आजीविका का साधन रही मछलियों की भरमार नहीं होगी; तब तक लखीबेन की तरह सैंकड़ों महिलाओं को हर शाम वनकबारा, पोरबंदर और वेरावल के समुद्र तट की ओर इस आस में टकटकी लगाये आसानी से देखा जा सकता है कि शायद उसके पति, बेटे मछली पकड़ कर अपनी नाव से घर की ओर लौट रहे होंगे।

Share →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>